पाठ्यक्रम: GS3/रक्षा
संदर्भ
- वित्तीय वर्ष (FY) 2025-26 में भारत का वार्षिक रक्षा उत्पादन बढ़कर ₹1.78 लाख करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया है।
परिचय
- यह विगत वित्तीय वर्ष की तुलना में 15.6% की वृद्धि तथा वित्तीय वर्ष 2020-21 की तुलना में 110% की वृद्धि को दर्शाता है।
- कुल रक्षा उत्पादन में रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSUs) एवं अन्य सार्वजनिक उपक्रमों का योगदान लगभग 76% रहा, जबकि निजी क्षेत्र का योगदान 24% रहा।
- वर्तमान में लगभग 65% रक्षा उपकरणों का उत्पादन देश में ही किया जा रहा है, जबकि पहले भारत की आयात निर्भरता 65–70% तक थी।
- भारत ने वर्ष 2029 तक ₹3 लाख करोड़ के रक्षा उत्पादन तथा ₹50,000 करोड़ के रक्षा निर्यात का लक्ष्य निर्धारित किया है।

रक्षा उत्पादन में वृद्धि के प्रमुख कारक
- बढ़ता रक्षा बजट:


- अनुसंधान, नवाचार एवं साझेदारी: वित्तीय वर्ष 2026-27 में रक्षा अनुसंधान एवं विकास (R&D) के लिए आवंटन, वित्तीय वर्ष 2014-15 की तुलना में 112% से अधिक बढ़ा है।
- सरकार ने वर्ष 2022-23 में रक्षा R&D बजट का 25% उद्योगों, स्टार्ट-अप्स तथा शैक्षणिक संस्थानों के लिए खोल दिया।
- इनोवेशन्स फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (iDEX): यह पहल एमएसएमई, स्टार्ट-अप्स, व्यक्तिगत नवोन्मेषकों, अनुसंधान संस्थानों तथा शिक्षाविदों को स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकियों के विकास में सक्रिय रूप से शामिल करती है।
- डेवलपमेंट कम प्रोडक्शन पार्टनर (DcPP) मॉडल: इस मॉडल के अंतर्गत DRDO प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के माध्यम से सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों से सक्षम विनिर्माण भागीदारों का चयन करता है।
- इसके पश्चात उत्पादन हेतु आवश्यक प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण किया जाता है।
- तकनीकी आत्मनिर्भरता हेतु मानव संसाधन क्षमता निर्माण: DRDO ने वर्ष 2020 में पाँच युवा वैज्ञानिक प्रयोगशालाएँ (DYSLs) स्थापित कीं तथा वर्ष 2026 में छठी प्रयोगशाला स्थापित किए जाने के साथ इनकी कुल संख्या 36 हो जाएगी।
- नव-नियुक्त वैज्ञानिकों को प्रयोगशालाओं में नियुक्ति से पूर्व डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड टेक्नोलॉजी (DIAT) में रक्षा प्रौद्योगिकी विषय में दो वर्षीय एम.टेक. कार्यक्रम पूरा करना अनिवार्य है।
- आत्मनिर्भरता को प्रोतसाहन देने हेतु रक्षा अधिग्रहण सुधार: रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020 के माध्यम से स्वदेशी खरीद, घरेलू विनिर्माण तथा उच्च स्वदेशी सामग्री को प्राथमिकता दी गई।
- भारत की रक्षा कूटनीति: भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए प्रमुख वैश्विक शक्तियों के साथ साझेदारी का विस्तार किया है।
- रक्षा सहयोग अब केवल सैन्य आदान-प्रदान तक सीमित न रहकर प्रौद्योगिकी सहयोग, औद्योगिक साझेदारी एवं संयुक्त विनिर्माण तक विस्तारित हो चुका है।
रक्षा स्वदेशीकरण सुधारों की आवश्यकता
- रणनीतिक स्वायत्तता एवं राष्ट्रीय सुरक्षा: स्वदेशी रक्षा उत्पादन संकट अथवा भू-राजनीतिक तनाव की परिस्थितियों में विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता को कम करता है।
- क्षमता संबंधी अंतरालों समापन: भारत को अपनी सीमाओं तथा हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में जटिल सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
- सेना, नौसेना एवं वायुसेना के पुराने प्लेटफॉर्मों के प्रतिस्थापन हेतु आधुनिकीकरण आवश्यक है।
- आयात व्यय में कमी एवं आर्थिक दक्षता को प्रोत्साहन: भारत विश्व के सबसे बड़े हथियार आयातकों में से एक है।
- स्वदेशी उत्पादन दीर्घकाल में लागत को कम करता है, विदेशी मुद्रा के बहिर्गमन को घटाता है तथा घरेलू रक्षा अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाता है।
- घरेलू रक्षा औद्योगिक आधार का सुदृढ़ीकरण: स्वदेशीकरण रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों, एमएसएमई तथा निजी उद्योगों में नवाचार एवं विकास को प्रोत्साहित करता है।
- तीव्र खरीद प्रक्रिया एवं परिचालन तत्परता: घरेलू विनिर्माण खरीद प्रक्रियाओं को संक्षिप्त करता है तथा समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करता है।
- बेहतर अनुकूलन एवं अनुकूलनीयता: स्वदेशी प्लेटफॉर्मों को भारतीय भौगोलिक परिस्थितियों—हिमालयी उच्च क्षेत्र, मरुस्थल तथा समुद्री क्षेत्रों—के अनुरूप विकसित किया जा सकता है।
- इससे बदलते सुरक्षा खतरों के अनुरूप निरंतर उन्नयन संभव होता है।
- प्रौद्योगिकीय संप्रभुता: स्वदेशी प्रौद्योगिकियों का विकास डिजाइन, उत्पादन तथा भविष्य के उन्नयनों में स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है।
- साथ ही, यह प्रतिबंधों, आपूर्ति शृंखला व्यवधानों एवं प्रौद्योगिकी निषेधों से उत्पन्न जोखिमों को कम करता है।
भारत के बढ़ते रक्षा उत्पादन का महत्व
- क्रेता से निर्माता बनने की संरचनात्मक परिवर्तन यात्रा: भारतीय रक्षा उत्पादों का निर्यात अब विश्व के 80 से अधिक देशों को किया जा रहा है।

- रक्षा औद्योगिक क्षमता का विस्तार: वर्तमान में भारत का स्वदेशी रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र 16 रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSUs), लगभग 500 लाइसेंस प्राप्त रक्षा कंपनियों तथा लगभग 17,000 सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) से मिलकर बना है।
- रक्षा औद्योगिक गलियारे: वर्ष 2026 तक उत्तर प्रदेश रक्षा औद्योगिक गलियारे में ₹42,057 करोड़ के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए।
- तमिलनाडु रक्षा औद्योगिक गलियारे में ₹32,699 करोड़ के निवेश प्रस्ताव आकर्षित हुए।
प्रमुख सरकारी पहलें
- रक्षा विनिर्माण में व्यवसाय सुगमता : वर्ष 2015 में रक्षा लाइसेंस की प्रारंभिक वैधता अवधि को बढ़ाकर 15 वर्ष कर दिया गया, जिसे आगे 18 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।
- शस्त्र अधिनियम के अंतर्गत कंपनियों को प्रदान किए गए लाइसेंस अब कंपनी के जीवनकाल तक वैध रहते हैं।
- संशोधित रक्षा निर्यात-आयात पोर्टल: यह पोर्टल आवेदन की संपूर्ण प्रक्रिया, स्वचालित कंपनी सत्यापन, सरल पंजीकरण, वास्तविक समय ट्रैकिंग तथा सुरक्षित भुगतान एकीकरण की सुविधा प्रदान करता है।
- उद्योगों के माध्यम से स्वदेशीकरण: रक्षा मंत्रालय ने वर्ष 2020 में सृजन रक्षा पोर्टल प्रारंभ किया।
- इस पोर्टल पर DPSUs तथा सेवा मुख्यालय (SHQs) स्वदेशीकरण हेतु रक्षा सामग्रियों की सूची उद्योगों, विशेषकर MSMEs एवं स्टार्ट-अप्स, को उपलब्ध कराते हैं।
- सृजन डीप : रक्षा उत्पादन विभाग ने Srijan DEEP (रक्षा प्रतिष्ठान और उद्यमी मंच) विकसित किया है।
- यह रक्षा उद्योगों का एक डिजिटल डेटाबेस है।
- यह पोर्टल रक्षा निर्माताओं, MSMEs, सेवा प्रदाताओं एवं प्रौद्योगिकी प्रदाताओं के लिए एक व्यापक भंडार के रूप में कार्य करता है।
- रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI): वर्ष 2020 में रक्षा क्षेत्र में FDI सीमा को स्वचालित मार्ग से 74% तथा सरकारी मार्ग से 100% तक बढ़ा दिया गया।
- रणनीतिक साझेदारी (SP) मॉडल: वर्ष 2017 में भारतीय कंपनियों एवं वैश्विक मूल उपकरण निर्माताओं (OEMs) के बीच दीर्घकालिक साझेदारी स्थापित करने के उद्देश्य से इसे प्रारंभ किया गया।
- इन साझेदारियों का मुख्य उद्देश्य प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा भारत में विनिर्माण अवसंरचना का विकास है।
आगे की राह
- रणनीतिक नीतिगत हस्तक्षेपों, घरेलू भागीदारी में वृद्धि तथा स्वदेशी नवाचार पर विशेष बल के संयोजन ने भारत की रक्षा क्षमताओं को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया है।
- वर्ष 2029 के लिए निर्धारित महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के साथ भारत वैश्विक रक्षा बाजार में अपनी उपस्थिति को अधिक विस्तारित करने की दिशा में अग्रसर है। इससे भारत न केवल अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करेगा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी अधिक सुदृढ़ बनाएगा।
Source: TH
Previous article
VB-G RAM G को निरस्त करने की मांग